Wednesday, March 3, 2010

अभिव्यक्ति का नया मंचः ब्लॉग

रूपरेखा

1.0 उद्देश्य
1.1 प्रस्तावना
1.2 ब्लॉग बनाम चिट्ठा
1.3 हिंदी ब्लॉगिंग का संक्षिप्त इतिहास
1.4 हिंदी चिट्ठों / ब्लॉग्स की विशेषताएँ
1.5 ब्लॉग पोस्ट/एक उदाहरण का पाठ
1.6 टिप्पणी
1.7 चिट्ठों में उभरता हिंदी का चेहरा
1.8 सारांश
1.9 प्रश्न एवं अभ्यास

1.0 उद्देश्य
इंटरनेट पर तमाम तरह की जानकारी उपलब्ध है। अनेक प्रारूपों में से एक प्रारूप ब्लॉग भी है। ब्लॉग को हिंदी में ‘चिट्ठा’ नाम दिया गया है। ‘ब्लॉगिंग’ को ‘चिट्ठाकारिता’ कह सकते हैं। यह हिंदी जगत् के लिए एक नई उभरती विधा है। 1999 में पहला ब्लॉग सामने आया था, जबकि हिंदी में पहला ब्लॉग 2003 में लिखा गया। मात्र 10-11 वर्ष की आयु की यह विधा आज अत्यंत लोकप्रिय है। आज इससे करोड़ों लोग जुड़ चुके हैं। हिंदी में भी लाखों चिट्ठे (ब्लॉग्स) पढ़े जा सकते हैं।
इस पाठ को पढ़कर आप-
· ब्लॉग या चिट्ठा क्या है, इससे परिचित हो सकेंगे।
· हिंदी ब्लॉगिंग के संक्षिप्त इतिहास को जान सकेंगे।
· हिंदी चिट्ठों की विशेषताओं से परिचित हो सकेंगे।
· एक रोचक उदाहरण पढ़कर हिंदी ब्लॉग का सही स्वरूप समझ सकेंगे।
· इस नई विधा में हिंदी भाषा के उभरते नए चेहरे को पहचान सकेंगे।

1.1 प्रस्तावना
इंटरनेट पर हिंदी का प्रचलन अब निरंतर बढ़ता जा रहा है। ‘ब्लॉग लेखन’ भी इस प्रचलन का एक नया आयाम है। ‘इंटरनेट’ यों तो खूब परिचित और प्रचलित शब्द है, किंतु इसकी हिंदी करें तो- ‘अंतर्जाल’ हो सकती है। कुछ लोग ‘इंटरनेट’ को ‘अंतर्जाल’ कहते भी हैं। हम इसे ‘अंतर्नेत्र’ भी तो कह सकते हैं। खैर छोड़िए, ये तो अनुवाद- प्रतिअनुवाद की बातें हैं, मूलबात यह है कि आज ‘इंटरनेट’ सारी दुनिया की जानकारी घर बैठे देने वाली कंप्यूटर तकनीक है। शिकायत यह बनी रहती चली आई है कि इसका लाभ अंग्रेजी जानने वाले ही उठा सकते हैं। किंतु ऐसी बात नहीं है। हर भाषा का जानकार इस तकनीक का लाभ उठा सकता है। हिंदी भाषा का जानकार भी। बस थोड़ी बहुत अंग्रेजी और कंप्यूटर काम करने की जानकारी आपको होनी चाहिए।
‘blog’= ‘weblog’ का संक्षिप्त रूप है। यह वस्तुतः website का एक प्रकार है। जो किसी एक व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के समूह, फोरम, ग्रुप,समुदाय – द्वारा निरंतर लिखे जाने के लिए प्रयोग किया जाता है। वे इसमें अपने विचार, घटनाएँ, या अन्य सामग्री शब्दों में, चित्रों के माध्यम से या वीडियो के प्रयोग के साथ दर्ज कराते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि ‘ब्लॉग’ इंटरनेट पर प्रचलित एक नई विधा है। दरअसल ‘ब्लॉग’ वह स्पेस है, जिसमें कोई भी व्यक्ति अपनी रूचि, सुविधा और इच्छा से कोई भी सामग्री लिख सकता है और इंटरनेट पर डालकर सारी दुनिया के लिए उपलब्ध करा सकता है। एक तरह से आप इसे अपनी ‘डायरी’ कह सकते हैं। अपनी निजी बातों, रूचियों, इच्छाओं, किसी भी वषय पर अपने मुक्त, स्वच्छंद और मौलिक विचार, टिप्पणी आदि को सार्वजनिक करते हुए दुनिया के किसी भी कोने में बैठे जाने-अनजाने ‘पाठकों’ से शेयर कर सकते हैं। आपको अपने लिखे विचारों पर उनकी टिप्पणी भी वापस पढ़ने को मिल जाएगी। इस तरह यह संवाद या परस्पर संचार का सबसे अच्छा माध्यम है। संकोच या किन्हीं मजबूरियों की वजह से आप जिन बातों को कहने, लिखने, सार्वजनिक करने में अपने को असमर्थ पाते हैं, ब्लॉग लिखकर उन्हें निस्संकोच सार्वजनिक कर सकते हैं। यही नहीं, साहित्य और राजनीति से लेकर सामाजिक सरोकारों से जुड़ी तमाम तरह की बातों को किसी से भी शेयर कर सकते हैं।

1.2 ब्लॉग बनाम चिट्ठा
‘ब्लॉग’ को हिंदी में ‘चिट्ठा’ कहा जाता है लेकिन ‘ब्लॉग’ शब्द खूब प्रचलन में है। ‘ब्लॉगिंग’ इंटरनेट पर किया जाना वाला लेखन है। इस लिखे हुए को ‘पोस्ट’ कहा जाता है। संभावतः इसीलिए ब्लॉग को ‘चिट्ठा’ कहा गया होगा। प्रत्येक ‘पोस्ट’ एक स्वतंत्र ‘वेब एड्रेस’ होता है। पाठकों को इन ‘पोस्ट’ पर अपनी प्रतिक्रिया या टिप्पणी लिखने की स्वतंत्र होती है। इस विचार से हम तकनीकी तौर पर यह कह सकते हैं कि इंटरनेट के सूचना प्रधान हैवी ट्रेफिक जोन से पर व्यक्तिगत स्पेस में अपने निजी विचारों, भावों अथवा प्रतिक्रियाओं की स्वच्छंद सार्वजनिक अभिव्यक्ति ही ब्लॉगिंग है।
इस तरह ब्लॉग-लेखन के तीन महत्वपूर्ण घटक हैं-
1. इंटरनेट
2. व्यक्तिगत स्पेस
3. अभिव्यक्ति
अभिव्यक्ति की तीन विशेषताएँ हैं-
निजी विचार, भाव अथवा प्रतिक्रियाएँ
स्वच्छंदता
सार्वजनिकता
ये व्यक्तिगत विचार या भाव शब्दों, रेखाओं, चित्रों या किसी भी तरह की भाषा में व्यक्त हो सकते हैं। आप चाहें तो मल्टीमीडिया का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। कई ब्लॉग किसी खास विषय पर कमेंटरी या समाचार देते देखे जा सकते हैं। लेकिन अधिकांश ब्लॉग एक ऑनलाइन व्यक्तिगत डायरी की भांति काम करते हैं। पाठकों के प्रतिक्रिया देने या टिप्पणी लिखने की सुविधा इसे विचार-विमर्श के ढांचे से जोड़ती है। यह ब्लॉग की सबसे बड़ी विशेषता है। एक ब्लॉग (चिट्ठा) के दो स्पेस होते हैं-
पोस्ट, जिस पर लेखक के रूप में एक ब्लॉगर (चिट्ठाकार) अपनी बात लिखता है/लिखकर पोस्ट करता है।
टिप्पणी, जो ब्लॉग रीडर्स (चिट्ठा-पाठकों) के लिए>
ब्लॉग बनाना अपनी website या e-mail बनाने जैसा है। आपको अपना एक नाम चुनना है और पासवर्ड। आपका मुफ्त में खाता खुल जाएगा। बस आप जो चाहें लिखते चले जाएं। ध्यान देने की बात यह है कि परंपरागत लिखत-पढ़त से अलग त्वरित टिप्पणी की सुविधा ही ब्लॉग (या चिट्ठा) को सही अर्थों में ब्लॉगिंग (चिट्ठाकारी) बनाती है। यह ब्लॉगिंग का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। इसी तत्व के कारण ही ब्लॉग-लेखन और उस लिखे पर की गई टिप्पणी या प्रतिक्रिया विमर्शात्मक बन जाती है। यह विमर्श रीयल टाइम में घटित होता है। “कालतुक्ष से होड़ है मेरी” स्टाइल में! त्वरित और तुरंताः।
हम जानते हैं कि किसी मुद्रित जनमाध्यम (प्रिंटमीडिया) में छपी हुई सामग्री पर पाठकों की प्रतिक्रिया छपकर सामने आती है, उसमें पर्याप्त समय लगता है। ऊपर से संपादकीय ‘कैंची’ चलने का खतरा भी होता है। यह भी हो जाता है कि जब तक आपकी प्रतिक्रिया या टिप्पणी छपकर सामने आए, तब तक उसकी प्रासंगिकता ही खत्म हो जाए! किंतु ब्लॉगिंग में टिप्पणी त्वरित होती है। साथ ही न यहाँ कोई संपादक बैठा है, न कोई नीति नियामक या नियंत्रण ब्लॉग लिखने वाला भी परम स्वतंत्र है और टिप्पणी या प्रतिक्रिया लिखने वाला भी परम स्वतंत्र है। दोनों पर कुछ भी लिखें, वह ज्यों का त्यों सामने आता है। आप स्वयं ही संपादक हैं, स्वयं ही नीति-नियामक और नियंत्रक! लांगडांट, चुहलबाजी, धौंस-धप्पल, मसखरापन, दार्शनिकता, उन्मुक्त विचार- यहां सब कुछ है और यह सब कुछ अपना है। सांझे का है।
ब्लॉग (या चिट्ठा) को डायरी का समानधर्मा माना जाता है। किंतु अपनी प्रकृति में यह डायरी नितांत निजी और व्यक्तिगत है। वह डायरी लेखक की इच्छा से बाद में कभी सार्वजनिक होती है। किंतु ब्लॉगतो लिखा ही जाता है। सार्वजनिक होने के लिए। लोगों से जुड़ने के लिए। इस बहुलतावादी विश्व समाज से जुड़ने की ललक ने ही वास्तव में ब्लॉग-लेखन को प्रेरित किया है। यानी, ‘लिंकित’ होने के लिए ब्लॉग लेखक का मन उतावला रहता है।
ब्लॉग एक सार्वजनिक मंच है। इसे चौपाल कह लें। या नुक्कड़ नाटक, जिसमें जिसका मन चाहे शरीक हो सकता है। ब्लॉग के पाठक अनंत हैं। ‘विश्वग्राम’ ये कहीं बी किसी भी कोने, कमरे नुक्कड़ पर बैठे आपके लेखे को पढ़ रहे और उस पर इच्छा होने पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए हर समय तत्पर हैं। आप दोनों अदृश्य हैं और लिखकर बातें कर रहे हैं। हाँ चाहें तो वेब कैमरे से अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं!
एक बात और ब्लॉग (या चिट्ठा) व्यक्तिगत भी हो सकता है और सामुदायिक भी। यह एक सांक्षी चौपाल का काम करता है। ब्लॉग कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे- व्यक्तिगत ब्लॉग, कार्पोरेट या संस्थाओं के ब्लॉग, सामुदायिक ब्लॉग, इसी तरह उनमें प्रयुक्त संसाधन या डिवाइस के आधार पर उन्हें मोबाइल या moblog, टैक्स्ट के साथ वीडियो प्रयोग के ब्लॉग Surveillance आदि के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। blog वीडियो ब्लॉग, sketchblog, photoblog, tumblegos (संक्षिप्त मिश्रित ब्लॉग) आदि भी ब्लॉग के कुछ प्रकार हैं।

1.3 हिंदी ब्लॉगिंग का संक्षिप्त इतिहास
जनवरी 1994 में Swarthmore ने किसी भी भाषा का पहला ब्लॉग links.net रचा था। Jorn Barger ने 17 दिसंबर, 1997 का ‘weblog’ शब्द को जन्म दिया। अप्रैल या मई 1999 में Peter Merholz ने ‘weblog’ को ‘blog’ नाम दिया। मजे की बात यह है कि उसने हंसी-मजाक में ही weblog शब्द को तोड़कर we log बना दिया। अपने blog peterme.com पर साइडबार पर उसने weblog अंकित कर दिया। वास्तव में ब्लॉग लॉगबुक ही तो है। जिसमें आप अपने भाव या विचार दर्ज करते हैं! यह निजी वेबसाइट का रूपांतरणक्षर कुछ समय बाद ही Ewon Willrams ने Pyara Labs पर ‘blog’ का प्रयोग संज्ञा और क्रिया के रूप में किया। ‘blog’ का अर्थ लिया गया- to edit ones beblog अथवा किसी के weblog को post करना असने ‘blogger’ शब्द को भी गढ़ा। इस तरह ‘ब्लॉग’ की उम्र महज दस साल है। 1999 में ‘वी ब्लॉग’ नाम से पीटर मर्होल्ज ने जो यात्रा अकेले शुरू की थी आज उस सफर में 13 करोड़ से ज्यादा लोग जुड़ गए हैं और यह यात्रा अभी जारी है।
हिंदी में पहला ब्लॉग सन् 2003 में लिखा गया जिसका नाम था hindi.blogspot.com. लेकनि तब इसकी लिपि देवनागरी नहीं थी, वह रोमन लिपि में लिखा गया था। बाद में इसमें देवनागरी प्रयुक्त होने लगी।
नीलिमा चौहान के एक लेख में एक उल्लेख यह मिलता है कि ‘वेब ब्लॉग’ का संक्षिप्त रूप ‘ब्लॉग’ दिसंबर, 1997 में पहली बार प्रयुक्त हुआ। अंतर्जाल पर पहले ब्लॉग (1997, वेब वाइनर का ब्लॉग ‘स्किप्टिंग न्यूज’) के उद्बव के छह साल बाद पहले हिंदी चिट्ठाकार आलोक के पहले चिट्ठे 9.2.11 का पदार्पण हुआ। पहली पोस्ट में उन्होंने लिखा-
नमस्ते।
क्या आप हिंदी देख पा रहे हैं?
यदि नहीं, तो यहाँ देखें।
यहाँ वह पहला लिंक था जिस पर क्लिक करते ही कोई हिंदी पाठत विश्व के किसी भी द्वीप पर बैठा अपनी भाषिक पहचान से जुड़ सकता था। यह पहली यूनीकोड चिट्ठा अभिव्यक्ति थी। यूनीकोड के अवतरण से विश्व का प्रत्येक कंप्यूटर हिंदी फोंटों के झंझटों से मुक्त हो हिंदीमय हो गया तथा हिंदी लेखक पाठक अपनी अनुभूति को टाइम स्पेस के बंधनों से परे अंतर्जाल पर दर्ज करा सका। यहाँ टाइम, स्पेस और प्रौद्योगिकी के अद्भुत संयोग से उपजी स्वच्छंद भाषिक अभिव्यक्तियों को आलोक ने चिट्ठा कहा। हमारे विचार से यह प्रौद्योगिकी का मानवीय चहेता है।
आलोक के बाद हिंदी में चिट्ठाकारों (ब्लॉगर्स) की लंबी कतार खड़ी होगा है। शुरू के कुछ नाम हैं- विनय, देवाशीष, पंकज नरूला, अतुल अरोरा, रवि रतलामी, अनूप शुक्ला, जितेंद्र आदि-आदि। इसके बाद तो नामी-गिरायी लोगों की श्रृंखला भी है और शौकिया चिट्ठाकारों की भी। जहाँ इनमें अमिताभ बच्चन भी शामिल हैं, तो कोई लल्लूपंजू भी!
पुनः नीलिमा चौहान के हवाले से प्रियंकर के एक ब्लॉग (चिट्ठे) का अंश उद्घृत कर हम हिंदी ब्लॉगिंग के रूप-स्वरूप और महत्व आदि को पढ़ सकते हैं-
“कभी-कभी तो मुझे यह सोचकर ही रोमांच होता है कि नेट पर हिंदी के शुरूआती कर्णधारों में पंकज नरूला, जितेंद्र चौधरी और देवाशीष चक्रवर्ती के होने का भी एक गहरा प्रतीकात्मक अर्थ है हिंदी की सार्वदेशिकता और स्वीकार्यता के संदर्भ में। मूलतः पंजाबी, सिंधी और बांग्ला मातृभाषा वाले परिवारों के इन बच्चों का हिंदी से कैसा प्यारा नेह का नाता है कि वे इसे मुकुटमणि बनाए हुए हैं। उसके भविष्य को लेकर चिंतनशील रहते हैं। उसे मां का मान दे रहे हैं।”
इसका प्रतीकात्मक अभिप्राय यह भीहै कि अब हिंदी पर हिंदी पट्टी के चुटियाधारियों का एकाधिकार खत्म होने को है। आंकड़े कहते हैं कि अगले दस-बीस वर्षों के दूसरी भाषा के रूप में हिंदी सीखने वाले विभाषियों की संख्या मूल हिंदी भाषियों से ज्यादा होगी। और तब एक नए किस्म की हिंदी अपने नए रूपाकार और तेवर के साथ आपके सामने होगी।
निश्चय ही ब्लॉग लेखन में हिंदी का नया रूपाकार और तेवर उभर कर सामने आने लगा है। इसे समझने के लिए हम कुछ प्रमुख ब्लॉग्स को पढ़ सकते हैं। जैसे- नारद (सर्वज्ञ नाम से प्रसिद्ध), ब्लॉग अड्डा, हिंदी ब्लॉग्स, भड़ास, फुरसतिया, सप्तरंग, मसिजीवी, निंकितमन, अक्षरग्राम, अनुभूति, अभिव्यक्ति, दिलमांगे मोर, रोज नाम था, कही अन कही, ब्लॉग वाली, चिट्ठा जगत्, अपनी दुनिया, ब्लॉगिस्तान, नर्मदा तीरे।

1.4 हिंदी चिट्ठों (ब्लॉग) की विशेषताएँ
हिंदी के चिट्ठों (blogs) पर पढ़ने को जो सामग्री मिलती रहती है, यदि उसका विश्लेषण किया जाए तो हमारे सामने उसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार होती हैं-
1. निजी बातें, विचार या भाव।
2. स्वच्छंदता, उन्मुक्ता और चुलबुलापन, जिसमें महीन व्यंग्य और छींटाकशी तक के लिए जगह है।
3. लापरवाह मनोवृत्ति, क्योंकि यह बिना लागलपेट कर लिखने का प्लेटफार्म है।
4. ब्लॉग-बिंदास अभिव्यक्ति, जिसमें अनौपचारिकता, भदेसपन आदि का समावेश है।
5. निद्वंद्वता और सजगता।
6. वैचारिकता
7. स्थानियों/रंगत और स्वाद।
कहने का आर्थ यह है कि कई भाषिक प्रवृत्तियां एक दूसरे के विपरीत भी हैं। एक कंट्रास्ट और एक कोलाज भी यह भाषा रच रही है। जैसा चिट्ठा वैसी भाषा यही है इसकी निजता। या कहें 1.5 ब्लॉग पोस्ट/एक उदाहरण जैसा चिट्ठाकर वैसी अभिव्यक्ति! कहीं-कहीं तो पोस्ट पर लिखी टिप्पणी में भी भाषा की ईको गूंजती सुनाई देती है। ब्लॉग की भाषिक प्रवृत्ति और कंटेंट को समझने के लिए हम एक ब्लॉग (फुरसतिया) का यह पोस्ट पढ़कर देखें।

1.6 टिप्पणी
जूते का चरित्र साम्यवादी होता है
समीरजी से हमें ये आशा नहीं थी।
हमने अप्रैल फूल वाले दिन, जो कि खास उनका ही दिन होता है, उनको ही खुश करने के लिए उनके साथ साइट बनाने की बात कही। इस पर वे जूते बाजी पर उतर आए और बोले लो हमने अपने अपने हिस्से की कर दी। अब आपकी बारी है। जूते बाजी उन्होंने करके जूता फाड़ दिया और अब हमसे कहते हैं- आप फटे जूते की व्यथा कथा लिखो। समीरजी ने लिखा है- जूते की सुनो वे तुम्हारी सुनेगा। यह कहते हुए उन्होंने जूतों की दर्दीजी दास्तान बयान की है। जूते का दर्द अपने शब्दों में बड़ी खूबसूरती से बयान किया है। जूते के दर्द को महसूसना और पूरी शिद्धत से उसे बयान करना यह समीर भाई के ही बस की है। वे बहुत विश्वास से कहते हैं- जूते की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा। उनके विश्वास को देखकर लगता है कि वे जूते की भाषा बहुत अच्छी तरह समझते हैं। यह तो कहो समीरजी अजातुशत्रु टाइप के आइटम हैं वर्ना उनका कोई चाहने वाला कह सकता था-समीरजी को जूते की ही भाषा समझ में आती है। लेकिन हम जानते हैं कि समीरजी केवल जूतों की ही भाषा नहीं बल्कि हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू आदि के अलावा प्रेम की भाषा पर अधिकार रखते हैं। उनकी यह पोस्ट उनके जूतों के प्रति उनके अनन्य प्रेम की परिचायक है।
हमें लिखने है फटे जूते ही व्यथा-कथा मतलब रोना-गाना। आंसू पीते हुए हिचकियां लेते हुए अपनी रामकहानी कहना। हाय हम इत्ते खूबसूरत थे लोग हम पर फिदा रहते थे और अब देखो चलते-चलते हमारा मुंह भारतीय बल्लेबाजी की दरार का कैसा खुल गया है। लुटने पिटने का अहसास, ठोकरों के दर्द का दास्तान बताना। मतलब अपने दर्द को गौरवान्वित करना। मुक्तिबोध के शब्दों में दुकों के दागों को तमगों सा पहनने का प्रयास करना। यह रुदाली तो हमसे ने सधेगी भाई। फटा हुआ जूता मतलब चला हुआ जूता। जो जूता चलेगा वही फटेगा। शो केस में रखे जूते बेकार हो जाते हैं, सड़ सकते हैं लेकिन फटते नहीं। फटने के लिए चलना जरूरी होता है। फटेगा वही जिसने राहों के संघर्ष झेले होंगे। कठोर जगहों पर ठोकरें मारी होंगी। राणा सांगा कहलाने के शरीर पर घाव खाने जरूरी होते हैं वैसे ही अच्छे चले हुए जूते पर चिप्पियाँ की सनद जरूरी होती है। चिप्पियों से फटे जूते का रुतबा उसी तरह जिस तरह तमाम आपराधिक मुकदमों की खेप से जनप्रतिनिधियों का रुतबा बढ़ता है।
जूते का प्रधान कर्तव्य अपने मालिक पैरों की रक्षा करना होता है। जो अपने कर्तव्य का निर्वहन न कर सके, चलते-चलते पैर को बचाने के लिए अपने सीने पर ठोकरें न खा सके, धूलि-धूसरित न हो सके वह जूता कैसा? जूते के नाम पर कलंक है ऐसा जूता जो पैरों की रक्षा करते-करते फट न गया। किसी ब्लागर कवि ने सही ही कहा होगा-
जो चला नहीं है राहों पर, जिस पर चिप्पी की भरमार नहीं,
वह जूता नहीं तमाशा है, जिसको मालिक पैरों से प्यार नहीं।
जैसे भारत में जब भी भ्रष्टाचार की बात चलती है, नेताओं का जिक्र आता है वैसे ही जब भी जूतों की जिक्र होता है राम की खड़ाऊं सामने आ जाती हैं। बड़े चर्चे हैं राम की खड़ाऊं के। भरत वन जाते हुए राम की खड़ाऊं अपने लिए मांग लाए थे। उसे सिंहासन पर रख लिया था और चौदह साल चलाते रहे राजकाज! भरत के मांगने और राम के देने के पीछो तो तमाम कारण रहे होंगे। राम का भाई के प्रति प्यार। पुराने जमाने में घर परिवारों में छोटे भाई के पल्ले बड़े भाइयों की उतरन ही पड़ती थी। भरत ने कहा होगा भैया तुम जा रही हो अपनी खड़ाऊं देते जाओ। या उन दिनों शायद जूते बहुत मंहगे मिलते होंगे सो रामजी ने सोचा होगा कि चौदह साल जंगल में रगड़ने अच्छा है इसे यहीं छोड़ जाएँ। यहां भरत पालिस-वालिस करवाते रहेंगे। यह भी हो सकता है कि उनके पांव के जूते काटते हों यह सोचकर छोड़ गए होंगे कि जंगल में दूसरे मिल जाएंगे। चौथा और सबसे अहम कारण यह होगा कि राम सिंहासन के लिए अपनी खड़ाऊं इसलिए छोड़ गए होंगे ताकि भरत को सिंहासन पर बैठने की आदत न लग जाए। वे अपनी खड़ाऊं उसी तरह सिंहासन पर रखने के लिए छोड़ गए जैसे लोकल ट्रेन में डेली पैसेंजर सीट पर रूमाल रखकर अपना कब्जा जमाते हैं। खड़ाऊं उन्होंने सिंहासन पर कब्जे के लिए छोड़ीं। बहरहाल यह तो उन महान भाइयों के बीच की आपसी बात है। सच क्या है यह वे ही जानते होंगे। लेकिन मुझे राम की खड़ाऊं से अधिक नाकार और कोई खड़ाऊं नहीं लगती। राम की पादुकाएं जूते के इतिहास का सबसे बड़ा कलंक हैं। जूते का काम पैरों की धूल-धक्कड़, काटें-झाड़ियों से पैरों की रक्षा करना होता है। ऐसे में राम खड़ाऊं उनके पैरों से उतरकर सिंहासन पर बैठ गयीं। यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसे कि सरकार गिरने का आभास होते ही जनप्रतिनिधि आत्मा की आवाज पर दल परिवर्तन कर लेते हैं। अपराधी जैसे जेल जाने का नाम सुनते अस्पताल में भरती हो जाते हैं वैसे ही राम की खड़ाऊं जंगल जाने की खबर उड़ते ही जुगाड़ लगाकर उचककर सिंहासन पर बैठ गयीं।
राम की खड़ाऊं को जंगल में जाकर राम के पैरों की रक्षा करना था। खुद ठोकर खाते हुए राम के पैर बचाने थे। लेकिन वे काम से मुंह चुराकर सिंहासन पर बैठ गयीं। भरत ने उसे पूजा की वस्तु बना दिया। शोभा की चीज बना दिया। आराधना करने लगे। कामचोर, कर्तव्य विमुख, नाकारा, अप्रासंगिक, ठहरी हुई पादुकाएँ पूजनीय बन गयीं। वंदनीय हो गयीं। हमारे देश में यह हमेशा से होता आया है कि जो अप्रासंगिक हो जाता है, ठहर जाता है, चुक जाता है वह पूजा की वस्तु बन जाता है। जो जितना ज्यादा अकर्मण्य, ठस, संवेदनहीन होगा वह उतना ही अधिक पूजा जाएगा। क्या बिडम्बना है।
जूते की जब भी बात होती है तब जुतियाने की जिक्र भी होता है। जुतियाने के सौंदर्य शास्त्र का गहन विश्लेषण रागदरबारी में श्रीलाल शुक्लजी कर चुके हैं। वे बताते हैं-
जूता अगर फटा हो और तीन दिन तक पानी में भिगोया गया हो तो मारने में अच्छी आवाज़ करता है और लोगों को दूर-दूर तक सूचना मिल जाती है कि जूता चल रहा है। दूसरा बोला कि पढ़े लिखे आदमी को जुतियाना हो तो गोरक्षक जूता का प्रयोग करना चाहिए ताकि मार तो पड़ जाये, पर ज्यादा बेइज्जती न हो। चबूतरे पर बैठे-बैठे एक तीसरे आदमी ने कहा कि जुतियाने का सही तरीका यह है कि गिनकर सौ जूते मारने चले, निन्यानबे तक आते-आते पिछली गिनती भूल जाए और एक से गिनकर फिर नये सिरे से जूता लगाना शुरू कर दे। इसके वैज्ञानिक पक्ष का अध्ययन किया जाए तो पता लगा है जूता दिमाग में भरी हवा निकालने के काम आता है। आपने देखा होगा जहां हवा भर जाती है वहां कसकर दबाने से समस्या हल हो जाती है। पेट की गैस बहुत लोग पेट दबाकर निकालते हैं। ऐसे ही दिमाग में हवा भर जाने से व्यक्ति का दिमाग हल्का होकर उड़ने लगता है। व्यक्ति आयं-बांय-सायं टाइप हरकते करने लगता है। ऐसे व्यक्ति के उपचार के लिए कुछ लोग मानसिक रोग शाला जाना पसंद करते हैं। अपने लिए हो तो मानसिक चिकित्सालय जाने की बात समझ में आती है। लेकिन दूसरों के लिए आदमी सरल उपाय ही खोजता है और जूते से मार-मार कर हवा निकाल देते हैं।
जूतेबाजी का मतलब है दिमाक को जमीनी हकीकत का अहसास कराना। चढ़े हुए दिमाग को धरती पर लाने। इसका असर वैसे ही होता है जैसे विद्युत धारा के धनात्मक और ऋणात्मक आवेश वाले तारों को एक साथ मिला देना। सर से जूते के मिलन होते ही सारे दिमाग का फ्यूज भक्क से उड़ जाता है। दिमाग में घुप्प अंधेरा छा जाता है। दिन में तारे दिखने लगते हैं। फिर बाद में धीरे-धीरे स्थिति पर नियंत्रण होता है।
बचपन से हम सुनते आए हैं कि आदमी की पहचान उसकी सोहबत से होती है। पिछले दिनों हमें झटका लगा जब हमारे फटे जूतों को बदलने का आग्रह करते हुए नया संवाद फेका गया-आदमी की पहचान उसके जूतों से होती है। जूते फटे-पुराने हैं मतलब आदमी चिथड़ा है। हमने तमान तर्कों से इस बात को यथासंभव खारिज करने की कोशिश की लेकिन यह संवाद कानों में बजता रहता है- आदमी की पहचान जूतों से होती है।
वैसे पुराने जमाने में ऐसा होता आया है जब आदमी की औकात के लिए जूता भी एक पैमाना माना गया। सुदामा के लिए दरबान ने कहा-पांय उपानहु की नहिं सामा। पैरों में जूतों की भी औकात नहीं है। धूमिल ने भी कहा है- यहाँ तरह-तरह के जूते आते हैं और आदमी की अलग-अलग ‘नवैयत’ बतलाते हैं सबकी अपनी-अपनी शक्ल है अपनी-अपनी शैली है।
ये बात औकात की है। लेकिन आदमी की पहचान जूतों से होती है यह सुनकर लगा कि किसी ने पूरे व्यक्तित्व को पर जूते बजा दिए हों। वैसे जूते की एक खासियत होती है। लोग भले जूते अपनी औकात के अनुसार खरींदे लेकिन जूता पैरों की औकात देखकर अपना काम नहीं करता। एक साइज का जूता एक ही तरह से व्यवहार करेगा, चाहे पहनने वाला अरबपति हो या खाकपति। जूता केवल पैर का साइज देखता है, पैर की औकात नहीं। जूता इस मामले में आदमी से ज्यादा साम्यवादी होता है।
आज जमाना हाइटेक है। जूते बाजी तकनीक-पालकी (तकनीक-पालकी शब्द राकेश खंडेलवालजी से साभार) बैठकर नये रूप में सजधजकर सामने आ रही है। आभासी जूतम पैजार का चलन बढ़ रहा है। लोग क्रिकेट में हार के लिए खिलाड़ियों को गरिया रहे हैं, कोच को कोस रहे हैं। जनता के दीवाने पन और मानसिक दीवालियेपन पर खीझ रहे हैं।
ब्लॉग जगत में यह आभासी जूताबाजी एक और रूप में प्रचलित है। इसे ब्लॉग जगत में टिपियाना कहा जाता है। लोग ऐसे-ऐसे टिपियाते हैं कि पढ़ने वाले का सर क्या पूरे बदन झनझना जाए। कोई अनाम लेखक के रूप में नाम वालों को जुतिया रहा है, कोई नाम वाले अनाम जुतियाने वालों प रकपड़े फाड़ रहा है। कोई इस बात पर कोस रहा है कि उसकी कविताओं की चर्चा नहीं हुई कोई इस बात पर उसकी कविता अचर्चित रह गयी। इसी क्रम में कोई मसिजीवी के लिए अनाम टिप्पणी कर जाता है, वे उसका दुख मनाते हैं, हम भी उस दुख में शामिल होते हैं। इस दुख पर अभय जी कुछ सवाल उठाते है और सृजन शिल्पी हाइटेक अंदाज में जुतियाते हैं। ये ऐसी चोट है कि खाने वाला न हंस सकता है न रो सकता है।
बहरहाल, अब आगे क्या लिखें समीरभाई। आप हमसे ज्यादा समझदार हो। आपको क्या सुनाये फटे जूते की कहानी। जो लिखने के लिए फटफटा रहा था वह निकल आया। आपके सामने हैं। आप बताओ कैसे लगे हमारे फटे जूते!

1.6 टिप्पणी
अब इस पोस्ट पर एक टिप्पणी पढ़ें-
धासूँ है भाई धासूँ जो जो रेफरेंस लाए हैं कि गजब ही ढहा दिए। बस पोस्ट चलते-चलते एकाएक ब्रेक लगा दिए, बड़ा झटका खाकर रुके।
उनके विश्वास को देखकर लगता है कि वे जूते की भाषा बहुत अच्छी तरह समझते हैं। यह तो कहो समीरजी अजातुशत्रु टाइप के आइटम हैं वर्ना उनका कोई चाहने वाला कह सकता था- समीरजी को जूते की ही भाषा समझ में आती है। लेकिन हम जानते हैं कि समीरजी केवल जूतों की ही भाषा नहीं बल्कि हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू आदि के अलावा प्रेम की भाषा पर अधिकार रखते हैं। उनकी यह पोस्ट उनके जूतों के प्रति उनके अनन्य प्रेम की परिचायक है।
पूरी रोलर कोस्टर राईड-खुद ही नीचे ले गये, खुद ही उपर..... हम तो बस पट्टा बांधे बैठे रहे। बहुत खूब।
बाकि आप इसे आगे नहीं बढ़ाये किसी और को अपनी पसंद देकर?? काहे भाई? पूरा शो बढ़िया रहा। मजा आ गया। इसी तरह जो चला नहीं है राहों पर, जिस पर चिप्पी की भरमार नहीं, वह जूता नहीं तमाशा है, जिसको मालिक पैरों से प्यार नहीं। यह किन महान ब्लॉगर कवि की पंक्तियाँ है, भाई जी??
इसी तरह आपने जूते की व्यथा कथा कही तो जूते खाने खिलाने के शौकीन लोगों की जमात में हलचल हुई। लोग सोचने लगे की हम तो इन पादुकाओं को निर्दलीय समझते थे क्योंकि हम तो मानते ते कि जूता पार्टी में तो वामपंथी और दक्षिणपंथी बराबर मात्रा में हैं तो ये निर्दलीय ही हुआ पर ये क्या जूते ने भी पार्टी बदल ली.... अच्छा लगा।

1.7 चिट्ठों में उभरता हिंदी का चेहरा
चिट्ठाकारी (ब्लॉगिंग) एक नितांत अनौपचारिक किस्म का लेखन है। यहाँ प्रायः चिट्ठा लेखक अपने नाम को छिपाता है, किंतु अपने आपको व्यक्तित्व नहीं छिपा पाता। वह अपना नाम-पता बदल सकता है। वह बहुरूपिया हो सकता है। वह संकेताक्षर हो सकता है। वैसे भी नाम में क्या रखा है! फिर भी अपनी पहचान बनाने की उसकी प्रबल इच्छा, जो उसे ठीक लगे, वैसे करने की ओर अग्रसर रहती है। अपने नाम-धाम-काम का चुनाव आपका अपना है। बेशक आप अपना सही प्रेमाहल देना चाहें, तो भी आपके हाथ में है। उसे जैसे डिजायन करना चाहें, यह भी आपके हाथ में है। आप कैसा भी मुखौटा लगाकर सामने आ सकते हैं। एक चिट्ठा पाठक के लिए तो जो आपने पोस्ट लिखा है, वह ही महत्वपूर्ण है और जो आप अपना परिचय देना चाहें वही स्वीकार्य है।
जहां तक चिट्ठा लेखन में प्रयुक्त हिंदी का सवाल है, यह किसी भी रूप में ढली हो सकती है। जैसा कि हम टिप्पणी से आपको स्पष्ट हो जाएगा। हिंदी चिट्ठाकारिता का जो छोटा सा इतिहास आख्यान है वह हिंदी पट्टी की राजनीति, राजभाषा की सरकारी नीति तथा हिंदीखोरों, हिंदीबाजों की गिद्धनीति से मुक्त है- इससे वह पतित पावन तो नहीं हो जाता लेकिन हिंदी लेखन की बाकी विधाओं से विशिष्ट अवश्य हो जाता है। यहाँ की हिंदी अंग्रेजी विरोध पर नहीं खड़ी है- अधिकांश चिट्ठाकार अंग्रेजी में लिखने में समर्थ हैं कुछ अंग3ेजी में चिट्ठाकारी करते बी हैं, सुनील दीपक तो अंग्रेजी, हिंदी के साथ-साथ इतालवी में ब्लॉग लिखते हैं। इसी तरह शुएब उर्दू में चिट्ठाकारी करते हुए हिंदी चिट्ठाकार हैं, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, मैथिली की चिट्ठाकारी के साथ-साथ हिंदी चिट्ठाकारी करने वाले चिट्ठाकार भी हैं। दूसरी खास बात संस्कृत के पाश से मुक्ति है, एक स्वयंसेवक चिट्ठे ‘लोकमंच’ को छोड़ दिया जाए तो कोई ‘देववाणी’ की आराधना के पचड़े में नहीं पड़ता। यह विविधता और आजादी हिंदी चिट्ठाकारी का अपना मौलिक मुहावरा गढ़ती है। इसमें गाली है, मोहल्ला है, इन सबसी पंचमेल खिचड़ी ही नहीं है वरन एकदम नए व्यंजन हैं। चिट्ठाकार भाषाई मानकों के फेर में नहीं पड़ता वरन उसे निरंतर प्रयोग से मांजता और निथारता है।
दरअसल यह नए किस्म की हिंदी है, आधुनिक हिंदी से आगे ‘उत्तर आधुनिक हिंदी’, जो एक चंचल और खिलाड़ी किस्म की हिंदी है। हिंदी ब्लॉग की भाषा पर यह टिप्पणी पढ़कर हमें ब्लॉग की भाषा पर यह टिप्पणी पड़कर हमें ब्लॉग के विषय में और भी बातें समझ में आ जाएगी।
“हर तरह को भाषा का अपना व्यवहार क्षेत्र (डोमेन) होता है” चाहे वह अखाड़े की भाषा हो, कारखाने की भाषा हो, कार्यालय की भाषा या फिर साहित्य की भाषा। आतंकवादियों के प्रति क्रोध को ‘ठुमरी’ और ‘निर्गुण’ के माध्यम से अभिवयक्त करना अभी हिंदी जगत में नया है। इसलिए थोड़ा अटपटा लगा। वरना जिसके जो जी में आए करे अपने को क्या। हां, लगता है अब इस नई विधा पर सोहरे गाने के दिन आ गए हैं।
समग्रतः हिंदी में ब्लॉग लेखन या चिट्ठाकारी का भविष्य अच्छा है। लेकिन इस अंतर्नेत्री (इंटरनेट!) विधा का पल्लवन-पुष्पन विश्वविद्यालयों के जड़ अकादमिक माहौल में प्रोफेसरों के माध्यम से नहीं होगा, यह होगा मुक्त वातावरण में मुक्त विचारों के समर्थक रचनात्मक विचारों वाले इंटरनेट यूजर्स के द्वारा। इनके द्वारा एक नई दुनिया रची जाएगी, जो कालजयी भले ही नहीं, लोकतांत्रिक, उन्मुक्त विचार-प्रवाह की नदी की तरह होगी। जिसके घाट पर असंख्य ‘संतों’ की भीड़ खड़ी होगी- इसका आचमन का नया रचनात्मक अस्वाद करती! अभी किसी तरह का ‘चिट्ठाशास्त्र’ लिखकर इसके प्रवाह को रोका नहीं जाना चाहिए। किंतु इस अभिव्यक्ति में नैतिकता और कानूनी पक्षों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। ऐसे कई प्रकरण सामने आए हैं, जो इन दोनों का उल्लंघन करते हैं। कई ब्लॉगरों ने अपने लिखे ब्लॉग्स को संपादित और संग्रहीत कर पुस्तक रूप में भी प्रकाशित कराया है। यह एक नई दिशा है जो ब्लॉग की लोकप्रियता का प्रमाण है।

1.8 सारांश
इस पाठ में सबसे पहले ब्लॉग या चिट्ठा के स्वरूप पर विचार किया गया है। इसकी विशेषताओं और रचना पर भी। इसके बाद ब्लॉग-लेखन का संक्षिप्त इतिहास है। इसके बाद हिंदी चिट्ठों की संरचना, विशेषरूप से भाषिक विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है।
ब्लॉग इंटरनेट पर प्रचलित एक नई विधा है। यह weblog का संक्षिप्त रूप है ब्लॉग वह स्पेस है, जिसमें कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि, सुविधा और इच्छा से कोई भी सामग्री लिख सकता है और इंटरनेट पर डालकर सारी दुनिया के लिए उपलब्ध करा सकता है। एक तरह से इसे आप अपनी ‘डायरी’ कह सकते हैं। यह संवाद या परस्पर संचार का सबमें अच्छा साधन है। संकोच या किन्हीं मजबूरियों की वजह से आप जिन बातों को सार्वजनिक करने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं, उन्हें ब्लॉग के माध्यम से निःसंकोच सार्वजनिक कर सकते हैं। साहित्य और राजनीतिक से लेकर सामाजिक सरोकारों से जुड़ी तमाम तरह की बातें किसी से भी शेयर कर सकते हैं। यों तो दुनिया का पहला ब्लॉग 1997 में लिखा गया था, किंतु हिंदी में यह 2003 में ही सामने आया। hindi.blogspot.com नाम से यह ब्लॉग देवनागरी में नहीं था, रोमन में लिखा गया था। बाद में देवनागरी में आने लगा। आज हिंदी में हजारों ब्लॉग हैं। अमिताभ बच्चन से लेकर छोटे से कस्बे तक का आम लड़का अपना ब्लॉग लिख रहा है।
हिंदी चिट्ठों (ब्लॉग्स) की अंतर्वस्तु (कंटेंट) और भाषा की विशेषताओं को साधने के लिए किसी एक ब्लॉग का पाठ करना जरूरी है। हमने इस पाठ में एक पोस्ट का उदाहरण दिया है। हिंदी चिट्ठों की जो प्रमुख विशेषताएं उभरकर सामने आती हैं, वे हैं-
1. निजी बातें, विचार या भाव
2. स्वच्छंदता, उन्मुक्ता और चुलबुलापन, जिनमें महीन व्यंग्य और छींटाकशी तक के लिए जगह है।
3. लापरवाह मनोवृत्ति
4. ब्लॉग-विंदास अभिव्यक्ति, जिसमें अनौपचारिकता, भदेसपन आदि का समावेश है।
5. सजगता
6. वैचारिकता
7. स्थानीय रंगत और स्वाद
हिंदी में चिट्ठाकारिता का विकास तेजी से हो रहा है। जिसका भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन यह अकादमिक बंधनों से मुक्त होकर ही आगे बढ़ेगी।

1.9 प्रश्न एवं अभ्यास
1. ब्लॉग या चिट्ठा किसे कहते हैं?
2. एक ब्लॉग के कितने हिस्से होते हैं?
3. ब्लॉग के माध्यम से आप क्या-क्या अभिव्यक्त कर सकते हैं?
4. ब्लॉग लेखन कब से शुरू हुआ?
5. हिंदी चिट्ठों (ब्लॉग्स) की प्रमुख विशेषताएँ लिखें।
6. हिंदी के कुछ ब्लॉग्स के नाम लिखें। उन्हें अपने इंटरनेट पर खोलकर पढ़ें।
7. अपना निजी ब्लॉग बनाये और मनपसंद विचार व्यक्त करें।

संदर्भ
1. वाक् (त्रैमासिक पत्रिका) अंक 2007 सं. सुधीश पचौरी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
2. आलोक, http://9211.blogspot.com/
3. फुरसतिया, जूते का चरित्र साम्यवादी होता है, = 265